Description
मैं कोई बड़ा ग़ज़लकार नहीं हूँ और न ही भाषा एवं व्याकरण का कोई प्रकांड विद्वान। संभव है कि मेरी ग़ज़लों में कहीं कोई तकनीकी कमी रह गई हो, या कोई विचार पूरी स्पष्टता से मुखर न हो पाया हो। यह मेरी सीमा भी है और मेरी सच्चाई भी – और मैं इसे खुले मन से स्वीकार करता हूँ। मेरी ग़ज़लों की असली प्रस्तावना अगर कोई लिख सकता है, तो वह आप ही हैं। जब यह किताब आपके हाथों में आएगी, आपकी निगाहों से गुज़रकर रूह तक पहुँचेगी और दिल से उठकर आपके लबों तक कोई प्रतिक्रिया बनकर आएगी – वही मेरी ग़ज़लों की सच्ची प्रस्तावना होगी। रवीन्द्रनाथ टैगोर से उनके जीवन के अंतिम दिनों में पूछा गया था कि उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना कौन-सी है? उन्होंने उत्तर दिया था: “मुझे खेद है कि मैं अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना अभी तक लिख नहीं पाया हूँ।” जब टैगोर जैसी महान विभूति यह कह सकती है, तो मेरी क्या बिसात! आज की रचना यदि कल की रचना के सामने कुछ फीकी लगे, तभी सृजन का सफ़र जीवित रहता है। यदि सब कुछ पूर्ण लगने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि प्रगति कहीं ठहर गई है। इसीलिए, आपसे मिलने वाली निष्कपट प्रतिक्रिया – चाहे वह प्रशंसा हो या कोई सुझाव – मेरे लिए समान रूप से अनमोल है। शायद उसी की रोशनी में, मैं आने वाले समय में कुछ और सच्चा और कुछ और गहरा लिख सकूँ। – विश्यु



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